मुझे याद है बचपन में जब कभी मम्मी पापा से कुछ लेने की जिद करता था तो पापा उसकी कीमत पूछ कर, फिर पचास पैसे एक रुपये कम वाली चीज दिला दिया करते थे. वैसे उन्होंने कभी मना नहीं किया किसी चीज के लिए, पर मैं उनको कभी बता भी नहीं पाया की मुझे वो साइड से बजाने वाली बांसुरी चाहिए.. क्योंकि वो पूरे ५ रुपये में मिलती थी. हमेशा वो एक रुपये वाली सीधी बजने वाली बांसुरी लेकर ही काम चलाया.
काफी बड़ा हो जाने पर भी टैम्पो में मम्मी पापा मुझे गोद में ही बैठा कर ले जाते थे. मुझे हमेशा यही लगता था की वैसे तो घर के खर्च में हजारों रुपये खर्च होते हैं, पर जब मैं कुछ मांगता हूँ तो क्यों वो एक एक रूपया बचाते हैं..
आज शाम को घर के पास की एक दूकान से १० रुपये का समोसा खाते हुए बरबस ही वो दिन याद आ गया जब मैंने पहली बार अलमारी से एक रुपये का सिक्का उठाकर भरी दोपहर में काफी दूर पैदल जाकर बिना किसी को बताये समोसा खाया था. यही सोच रहा हूँ की उसमे ऐसी क्या बात थी जो माइक्रोवेव में बेक किये हुए टिश्यु पेपर में सजाकर दिए गए समोसे में नहीं है. आर्थिक स्वतंत्रता किस हद तक पारिवारिक बंधनों पर निर्भर है.. क्या कर्त्तव्य वाकई में हमारी आर्थिक उनमुक्तता को नियंत्रित करने में सक्षम होते हैं?
वैसे अगर ये सब समझ में आ भी जाए तो क्या होगा... १५०० रुपये की एक विदेशी ब्रांड की बांसुरी पहले से ही मेरे पास है.

