Monday 2 November 2009

एक वो समोसा एक ये बांसुरी

मुझे याद है बचपन में जब कभी मम्मी पापा से कुछ लेने की जिद करता था तो पापा उसकी कीमत पूछ कर, फिर पचास पैसे एक रुपये कम वाली चीज दिला दिया करते थे. वैसे उन्होंने कभी मना नहीं किया किसी चीज के लिए, पर मैं उनको कभी बता भी नहीं पाया की मुझे वो साइड से बजाने वाली बांसुरी चाहिए.. क्योंकि वो पूरे ५ रुपये में मिलती थी. हमेशा वो एक रुपये वाली सीधी बजने वाली बांसुरी लेकर ही काम चलाया.

काफी बड़ा हो जाने पर भी टैम्पो में मम्मी पापा मुझे गोद में ही बैठा कर ले जाते थे. मुझे हमेशा यही लगता था की वैसे तो घर के खर्च में हजारों रुपये खर्च होते हैं, पर जब मैं कुछ मांगता हूँ तो क्यों वो एक एक रूपया बचाते हैं..

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आज शाम को घर के पास की एक दूकान से १० रुपये का समोसा खाते हुए बरबस ही वो दिन याद आ गया जब मैंने पहली बार अलमारी से एक रुपये का सिक्का उठाकर भरी दोपहर में काफी दूर पैदल जाकर बिना किसी को बताये समोसा खाया था. यही सोच रहा हूँ की उसमे ऐसी क्या बात थी जो माइक्रोवेव में बेक किये हुए टिश्यु पेपर में सजाकर दिए गए समोसे में नहीं है. आर्थिक स्वतंत्रता किस हद तक पारिवारिक बंधनों पर निर्भर है.. क्या कर्त्तव्य वाकई में हमारी आर्थिक उनमुक्तता को नियंत्रित करने में सक्षम होते हैं?

वैसे अगर ये सब समझ में आ भी जाए तो क्या होगा... १५०० रुपये की एक विदेशी ब्रांड की बांसुरी पहले से ही मेरे पास है.

Monday 19 October 2009

समानांतर चिट्ठाकारी

जब मैंने चिट्ठाकारी शुरू की थी, कुछ गिने चुने ही मुखिया लोगों का राज था. नए आते थे, और टिप्पणी के पीछे भागते भागते अपना दम तोड़ देते थे.. सालों गुजार देने के बाद भी नहीं जान पाते थे कि आखिर उन पुरानों के चिट्ठे इतने आबाद कैसे रहते हैं..

पिछले करीब एक वर्ष से अधिक समय से विभिन्न कारणों से  सक्रिय चिट्ठाकारी से दूर रहने के बाद ना जाने क्यों आज बड़ा मन कर रहा है कि एक किताब लिख दूँ.. फिर सोचा कि उसमे बड़ा वक्त खर्चा होगा, अगर वक्त ही होता तो चिट्ठाकारी भला क्या बुरी है..

वक्त की कमी और व्यस्तता से नए ख्याल आने ही बंद हो गए. लिखूं तो आखिर लिखूं क्या.. फिर इसी बीच चिट्ठाकारी के संभवतया सर्वाधिक पढ़े जाने वाले चिटठा "सारथी" के सबसे सम्माननीय लेखक शास्त्री जे सी फिलिप के संपर्क में आया और लगा की सोये मस्तिष्क को एक उद्वेलन मिल गया. मैंने कभी टिप्पणी और कभी अतिथि पोस्ट आदि के माध्यम से उनके द्वारा शुरू किये हुए सामजिक विषयों अपने विचार रखना शुरू किया. धीरे धीरे ये सिलसिला आगे बढ़ता गया.. आज इन्टरनेट पर मेरा जो भी सामाजिक दायरा है, उसका काफी श्रेय मैं शास्त्री जी के वैचारिक आन्दोलन को ही दूंगा.

मैं इसे "समानांतर चिट्ठाकारी" का नाम देना चाहूँगा जिसमे विषय तो किसी और का होता है पर विचार पूर्ण रूप से आप के अपने और मौलिक होते हैं भले ही संक्षिप्त सही और उन विचारों को व्यक्त करते वक्त आपके मन में किसी प्रकार का प्रलोभन नहीं होता.. प्रत्युत्तर में की गयी टिप्पणियों का तो बिलकुल भी नहीं.

मैं चाहूँगा की और भी लोग जो व्यक्त तो बहुत कुछ करना चाहते हैं, परन्तु निर्धारित विषयों अथवा समय की कमी की वजह से जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त करने से रह जाते हैं, उन्हें अपनी पसंद के एक या दो चिट्ठों पर इसी तरह समानांतर चिट्ठाकारी का मार्ग अपनाना चाहिए.

Monday 12 October 2009

वैभव का आनंदो-मेला

घर से बाहर अपना घर तलाश रहे लोगों की अपने चारो और एक सुरक्षा घेरा बना कर रहने की प्रवृत्ति कोई नयी नहीं है. अभी पिछले दिनों दुर्गा पूजा के मौके पर पुणे में भीं कई जगहों पर दुर्गा पूजा के अवसर पर सजाये गए पंडाल और आनंदों-मेला देखने का मौका मिला.

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क्या रौनक.. क्या रंगत.. चारों तरफ चमक ही चमक. कुछ भक्त टाइप के लोगों को छोड़ दें जो लाख समझाने के बाद भी देवी मां के चरणों में गिरे पड़ रहे थे और स्टेज का गेट-अप खराब कर रहे थे, चारो तरफ बंगाल की सुन्दरता और वैभव का राज था. देवी का स्टेज श्रृंगार एक कोने में था और बीचों बीच मुंबई से आये हुए बैंड और नृत्य कलाकार अपना जलवा बिखेर रहे थे. बीच बीच में स्कूली बच्चे भी बालगीत वगैरह से फिलर का काम अच्छे से निभा रहे थे.

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गहने और श्रृंगार अपने कौमार्य पर थे. नव विवाहिताओं ने बंगाली तरीके से आगे पल्लू करके साडी पहनी हुई थी. बस साडी के अलावा कुछ न था.. बाकी का भाग लम्बे बालों व गहनों से छुपाया गया था. मिहि दाना, रोसोगुल्ला, माछ भात, सौन्देश, बिरयानी जम कर छानी जा रही थी. शाकाहार का नामोनिशान भी नहीं था. अधेड़ लोग नयी उम्र के सजे धजे लड़कों को खाने के बहाने कोने में ले जाकर बाते करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे थे. ज्यादा से ज्यादा लड़कों को टेस्ट कर के अपना भावी दामाद खोजने के लिए उम्रदराज लोगों में होड़ लगी हुई थी.

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वैभव प्रदर्शन के ये आनंदों-मेले चिर आनंद के उत्सव लग रहे थे. जो भी हो, जय महाराष्ट्र के इलाके में लोगों को इस तरह बेधड़क बंगाली और उड़िया में बात करते देख कर बड़ा अच्छा लगा. पार्किंग स्टैंड और फूड स्टॉल्स के रसोइए तक बंगाली ही बोल रहे थे..

घर वापस आकर न चाहते हुए भी एक बात दिल में खटक कर ही रही कि.. क्या खराबी है छठ पूजा में जिसके आते ही पूरा महाराष्ट्र उत्तर भारतीयों के खून का प्यासा हो उठता है..

Friday 9 October 2009

गुड्डे गुड़िया और कुछ यादें दोस्तों की

जिंदगी की भीड़ में कितने ही लोग मिलते हैं बिछड़ जाते हैं पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो भले ही हमारे साथ न हों पर अपनी यादों से अपने आस पास ही होने का अहसास दिलाते रहते हैं..

आज कुछ ऐसे ही लोगों के नाम याद आ रहे हैं जेहेन में जिन्हें मिले हुए शायद १० से १५ साल तक गुजर गए हैं..
दीपाली मिश्रा, विवेक वर्मा, पूजा मिश्रा, ऋचा शर्मा, अभिषेक मिश्रा, अरविन्द यादव, मनीषा सिंह, विकास दीक्षित, पंकज सिंह, शरद अवस्थी, संजीव पाण्डेय, आशीष निगम, कल्प नाथ तिवारी, राजीव शुक्ला, सरफराज अहमद, रागिनी मिश्रा, धर्मेन्द्र यादव, सविता सिंह, जावेद अहमद, रोहित कुमार, राजर्षि पाण्डेय, विजय शंकर मिश्रा, सुमित त्रिपाठी, कल्पना वर्मा आदि

अब तक सब की तो नहीं पर कम से कम लड़कियों में से तो ज्यादातर की शादी भी हो चुकी होगी और एक दो बच्चे भी हो चुके होंगे. जो ज्यादा पढाकू टाइप के थे वो हो सकता है की अमेरिका में जा बसे हों. एक आध जो घिस्सू थे, वो कानपुर की किसी परचूनी या इलेक्ट्रिकल की दूकान चलाते भी मिल सकते हैं. जो मेरे टाइप के लोग थे वो जरूर रात के चार बजे किसी आई टी कंपनी में एक हाथ में कॉफी का मग थामे दूसरे हाथ से की बोर्ड पर किट पिट कर रहे होंगे..

वैसे तो भला हो इन कम्यूनिटी साइट्स का कि इन्ही जैसे कुछ दोस्त तो मुझे मिल चुके हैं और जिंदगी की व्यस्तताओं के चलते ज्यादा निकट संपर्क में न भी सही, पर कमसे कम जान पहचान में हैं. बाकी इन लोगों को मैंने ऑरकुट फेसबुक और इधर उधर जाने कितना खोजा, पर कुछ लोगों के तो नाम तक नहीं मिले, और जिनके मिले तो वो इतने ज्यादा मिले की कुछ निश्चित नहीं हो सका की कौन असली है. स्क्रैप कर कर के पूछा पर फिर भी निराशा ही हाथ लगी.

वैसे जिन लोगों के नाम ऑरकुट पर नहीं मिले वो ब्लॉग तो खैर क्या ही पढ़ते होंगे.. पर फिर भी एक उम्मीद है की इन सारे दोस्तों के नाम एक साथ देख कर कहीं किसी को कुछ याद आ जाए.. और अचानक एक दिन अपने बच्चों आदि के साथ मेरे घर पर मिलने आजाये.

उम्मीद पर तो दुनिया कायम है... देखते हैं मेरी उम्मीद किस दिन रंग लाती है..क्या पता की मेरे से दो क्यूबिकल छोड़ कर बैठी जो लड़की जो अपना काम धाम छोड़ मुझे देख कर सारा दिन स्माइल करती रहती है, वो मेरी कोई बचपन की सहेली निकल आये… फिर क्या... कहानी बनने में कोई देर थोड़े ही लगती है.

कस्तूरी प्रेम

प्रेम की तलाश में इंसान कहाँ नहीं भटकता पर कस्तूरी भला सबको कहाँ मिल पाती है.

महीनों गुजर गए पिछली पोस्ट को.. लेकिन इस दौरान तमाम मित्रों के व्यक्तिगत संदेशों और टिप्पणियों से लगा की अभी भी मेरे शुभचिंतक और मित्र लोग हैं जो मुझसे स्नेह करते हैं. समय और परिस्थितियां मुझे अनुमति नहीं दे रहीं थीं सक्रिय ब्लॉग्गिंग में वापस आने के लिए.. परन्तु जब भी मुझे वक्त मिलता है, मैं अपने सभी पसंदीदा ब्लोग्स पर पूरी नजर रखता हूँ. "सारथी" के पाठकगण मुझसे अवश्य सहमत होंगे.

आशा है की परिस्थितियां कभी इतनी विकट न होंगी की आप सभी के स्नेह और प्रेम से वंचित होना पड़े.