Monday, 10 November, 2008

ब्लोगिंग में पुन: वापसी के लिए प्रयासरत..

पिछले कुछ समय से ब्लोगिंग जगत में वापसी के लिए प्रयासरत था लेकिन अन्यान्य व्यक्तिगत कारणों और व्यवसायिक प्रतिबद्धताओं की वजह से सम्भव नहीं हो सका. इसीलिए इस बार पुन: प्रयास करते हुए यह सोचा है कि लिखने से पहले पढने के लिए अधिक समय निकालूँगा. और अगर सम्भव हो सका तभी लिखूंगा.

बहुत सम्भव है कि आपने इस प्रयास को अपने ब्लॉग पर टिप्पणी आदि के मध्यम से देखा हो. वैसे भी लेखन एक ऐसा कार्य है जिसके लिए कुछ अलग ही तरह कि प्रेरणा शक्ति कि आवश्यकता पड़ती है.. और वो प्रेरणा शक्ति किसी दुकान पर नहीं मिलती. उसके लिए तो मुझे घाट घाट का पानी पिए हुए मंझे लेखकों के सतत प्रतिबद्ध लेखन को पहले पढ़ना पड़ेगा.

आशा है कि पुन: वापसी के इस प्रयास में आप का सहयोग भी प्राप्त होगा.

Saturday, 1 March, 2008

29 फ़रवरी "भाई"चारा दिवस

ज्यादा अनुभव नहीं है अपने को, जब से जवान हुआ हूँ… मेरा मतलब है जब से लोगों ने जवान समझना शुरु किया है, तब से ये पहली ही 29 फ़रवरी आयी है मेरी जिन्दगी में।

अबकी बार ही पता चला कि वैलेन्टाइन से भी ज्यादा धाँसू व्यवस्था होती है इस दिन। 14 फ़रवरी के दिन मेरी गली के फ़ूलवालों के आस पास मैंने ऐसे ऐसे खरीददार देखे जिनके बारे में मैं सोच भी नहीं सकता था कि ये भी फ़ूल खरीदेंगे। पार्किंग स्टैंण्ड वाला, सब्जी वाला, सायकिल पंचर वाला और तमाम वो लोग जो रोज मार्केट में इधर उधर नजर आ जाते थे। लगता है, अब की किसी ने भी मौका नहीं छोड़ा। वैसे बजरंगदल वाले भी इनको परेशान नहीं करते। उनके निशाने पर तो कॉलेज के बच्चे और मध्यमवर्गीय लोग लोग ही रहते हैं।

खैर, मुद्दे की बात ये है कि मुझे अभी हाल ही में पता चला कि जैसे वैलेण्टाइन पर आमतौर पर लड़के अपनी सम्भावित प्रेमिकाओं को अपने दिल की बात बताते हैं वैसे ही 29 फ़रवरी के दिन अगर कोई लड़की अपने दिल की बात कहे तो इजहार का ये वार खाली नहीं जाता। भई कमाल है… इसका मतलब उस दिन जो लोग ज्यादा प्रतिस्पर्धा के चलते मारे गये थे या इससे पहले कि वो कहते, किसी और ने बाजी मार दी थी, तो उनको निराश होने की जरूरत नहीं।

जिन फ़ूलवालों ने जरूरत से ज्यादा स्टॉक कर लिया होगा वैलेण्टाइन्स डे के लिये, उनके बचे खुचे फ़ूल इस दिन बिक ही गये होंगे। वैसे भी फ़ूल देने वाले की भावनाओं और हिम्मत को देखना चाहिये, ना कि फ़ूलों की पंखुड़ियो के रंग और ताजगी को। अभी इस 29 फ़रवरी का अपडेट मिला नही है मुझे, पर उम्मीद है कि दो चार की जिन्दगी में तो बहार आयी ही होगी।

सलाह केवल इतनी ही है कि जिन बेचारों का जन्मदिन चार साल में केवल एक बार ही आता है, यदि उनको किसी कन्या ने (जो आमतौर पर आपको घास भी नहीं डालती) सहानुभूतिवश आपको जन्मदिन की बधाइयाँ दे दी हों तो उसे अन्यथा ना लें, वरना जमाने में लोगों का हमदर्दी और "भाई"चारे जैसी भावनाओं से तो भरोसा ही उठ जायेगा।

Tuesday, 19 February, 2008

हिन्दी युग्म से एक मुलाकात

पिछले काफ़ी लम्बे वक्त से अन्यान्य कारणों से मैं लेखन से एकदम दूर ही रहा। बीच में कुछ एक बार जोश को दोबारा समेट कर मैंने पाठकों से वादा भी कर दिया दोबारा से लेखन प्रारम्भ करने का, परन्तु सम्भव ना हो सका।

अभी पिछले सप्ताह दिल्ली के प्रगति मैदान में पुस्तक मेला में जाना हुआ। आखिरी दिन था और तमाम स्टॉल्स अपना सामान पैक कर के बोरिया बिस्तर लपेटने की फ़िराक में थे। फ़िर भी… जोश के साथ मैं किसी खास पुस्तक की तलाश में एक हॉल से दूसरे हॉल घूम रहा था।

तभी अचानक से एक ऐसे स्टॉल पर नजर पड़ी जिसमें कोई भी पुस्तक नहीं थी। बस कुछ लोग खड़े थे बैनर पोस्टर आदि लिये हुए। "हियु" का लोगो और कुछ सीडी आदि रखे हुए लोग आने जाने वालों को हिन्दी टंकण के बारे में बता रहे थे।

ये वही "हिन्दी युग्म" (www.hindyugm.com) के कार्यकर्ता थे जिन्होंने इन्टरनेट पर काफ़ी वक्त से हिन्दी के लिये काम करने का बीड़ा उठाया हुआ है। श्रीमान निखिल आनन्द गिरि से मुलाकात हुई। सभी लोगों से मुलाकात हुई। बड़ा हर्ष हुआ जब मेरी ब्लॉग की फ़ोटो के आधार पर एक भाई ने तो मुझे पहचान भी लिया। फ़िर हमने साथ में फ़ोटो भी खिंचवाई। उन्होनें मुझे गेस्टबुक भी लिखने का आग्रह किया।

आदतवश मैंने लिखने के पहले उसके कुछ पन्ने उलटे, जिसमें मुझे हिन्दी साहित्य के तमाम बड़े नाम मिले जिनको मैं बचपन से जानता था, और वो लोग उस स्टॉल पर आ चुके थे। कई बड़े ब्लॉगर लोग भी उस सूची का हिस्सा बने हुए थे। उन लोगों की सूची में अपना नाम आने पर अपार खुशी हुई।

इस एक मुलाकात ने मुझे प्रेरणा दी कि मैं दोबारा से लेखन की शुरुआत करूँ। हिन्दीयुग्म से जुड़े सभी कार्यकर्ताओं को इस जीवट प्रयास के लिये धन्यवाद एवं भविष्य के लिये शुभकामनायें।

खराब बात सिर्फ़ एक रही इस मुलाकात में, कि चलते वक्त उनसे 50 रुपये मूल्य की एक सीडी खरीदनी पड़ी भावुक होकर जिसे सुनने का मुझे आज दिन तक मौका नही मिला।

Saturday, 9 February, 2008

ताकि सनद रहे

पढ़ता तो मैं सभी को आ ही रहा था पर अब फ़िर से सक्रिय लेखन में वापसी का इन्तजार है…

Friday, 11 January, 2008

दिल है कि मानता नहीं

अब तो ठीक से याद भी नहीं पड़ रहा कि कितने दिन हो चले हैं मुझे ब्लॉग पोस्ट लिखे हुए… करीब 20 दिन, और आज जब फ़िर से कुछ लिखने का मन किया तो अचानक से कुछ ऐसा याद हो आया कि मुस्काये बिना रह ना सका।

मुझे यकीन ही नहीं होता कि इस चिट्ठाकारी के पीछे पड़े रहने की वजह से मैंने क्या हाल बना रखा था अपना। मैंने अपने गूगल रीडर एकाउन्ट में कमसे कम ढ़ाई सौ चिट्ठे जोड़ रखे हैं। जब भी उसे खोल कर देखो, सारे चिट्ठे पढ़ लेने की अजीब सी छटपटाहट सी बनी रहती है और भगवान झूठ ना बुलाये, ऐसे ऐसे मरियल चिट्ठों पर टिप्पणी भी पता नहीं किस मिशनरी भाव से करता था कि पूछिये मत, और सब का सब तथाकथित टीआरपी बनाये रखने के लिये।

सोते जागते, खाते पीते उन लोगों का कम ख्याल रखता था जो हमारे आस पास हैं, बल्कि उन लोगों से एक काल्पनिक सा सम्वाद चलता रहता था जो सिर्फ़ चिट्ठाकारी के बगीचों में ही घूमते मिलते थे। हर नयी पोस्ट के बारे में सोचने पर ये ख्याल आता था कि वो लोग जो अक्सर मेरे चिट्ठे पर आया करते हैं, उन्हें कैसा लगेगा, वो इसके बारे में क्या सोचेंगे।

पर ब्लॉगिग से इन बीस दिनों के अलगाव के बाद जो कुछ ग्यान दर्शन हुआ है, अगर किसी को दे दूँ तो बन्दा इस भवसागर से पार लग जाये। इन बीस दिनों में मेरी महीनों से धूल खा रही किताबें बाहर निकल आयीं, हमेशा मुझसे वक्त ना निकाल पाने की शिकायत करने वाले दोस्तों ने मेरी महफ़िल और चुटकुलों का आनन्द लिया, सास बहू की जिस कॉमेडी का मैं ब्लॉगिंग से भी तुच्छ कह कर तिरस्कार करता था, उन सारे सीरियलों की कहानियाँ भी अपडेट कर लीं जिससे अगले 6 महीने तक दोबारा देखना ना पड़े।

कहने का मतलब मेरे पास हर बात के लिये वक्त ही वक्त। लेकिन आज इतने दिनों बाद फ़िर से कुछ लिखते हुए मन में यही ख्याल आ रहा है कि जो मान जाये वो इन्सान ही क्या… वैसे भी ये चिट्ठाकारी है ही ऐसी जिससे दिल है कि मानता नहीं।